मानव जीवन में सत्यता को स्वीकारना अपने आप में ही एक अदभुत चुनौती है चाहे वो किसी भी रूप में हो ! मनुष्य को कभी भी सत्यता से मुख नहीं मोड़ना चाहिये उसे हर रूप में स्वीकारना ही उसका मानव धर्म होना चाहिए ! यदि सत्यता को न स्वीकारोगे तो कहाँ जाओगे ? खुद से दूर या फिर इस समाज से दूर ! सत्यता से बचने के लिये भले ही तुम खुद से दूर भाग लो परन्तु सत्यता कहीं नहीं भाग सकती क्योंकि वह तो अखण्ड होती है ! उसमें कोई भी छल ,द्वन्द या द्वेष विद्घमान नहीं होता ! परन्तु मानव अपने अहंकार के रहते उसे स्वीकार नहीं पाता ! यही कारण है कि उसे मानव जीवन भी एक अभिशाप लगने लगता है !