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Showing posts from December, 2017

बहुत याद आती हो तुम

तेरा यूँ साथ चलना तेरा यूँ मुस्कुराना  मेरे हर सुख़ दुख़ को अपना कहना मुझे बहुत याद आता है मेरे माथे पर पड़ी उन सिलवटों को देखकर तेरा मुझसे कुछ पूछना मेरे लाख मना करने पर भी  तेरा मेंरे मन को पढ़ लेना अद्भुत था कभी साथ चलते चलते तेरा कुछ सोचना फिर दूर जाकर बैठकर तेरा मुझसे कुछ पूछना आज भी सब याद है कुछ नहीं भुला हूँ मैं तेरे संग बिताये हुये  हर एक पल का हिसाब  लिखा है मेरे पास कभी आओ तुम भी पढ़ो तो शायद मैं भी पढ़ लूँ थोड़ा तेरे बग़ैर दिल नहीं चाहता  उस डायरी को उठाने का मुझे भीतर तक झकझोर देती हैं तेरी वो यादें तेरी वो बातें सोचता हूँ कि हँसकर याद करूँ तुझे मग़र न जाने क्यूँ ये उदासी दूर जाती नहीं न जाने कितना पसंद आ गया हूँ मैं इसको कभी किसी छोटी सी बात पर  तेरा रोना तेरी उस उदासी भरी शक़्ल में तेरी मासूमियत छिपी होना याद करता हूँ तो  एक मुस्कान लाने को मजबूर हो जाता हूँ समझ नहीं आता  अब क्या करूँ इन यादों का इन को हँसकर याद करूँ या यूँ ही रोता रहूँ  टूट चुका हूँ मैं मै...