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Showing posts from April, 2018

सिक्कों सा खनकता बचपन

       बाज़ार में छाई हुई हर ओर की रंगीनियां मुझे लुभा रही थीं और अपने पास बुलाने को बेबस कर रही थीं। मगर उस गर्मी की सुलगती धूप में मैं चली जा रही थी। उस सड़क की गरमाहट मुझे और जला रही थी। पास निकलने वाली गाड़ियाँ मुझे ऐसे दिख रही थी जैसे कि मैं हर एक गाड़ी का पीछा कर रही हूँ और इस कदर भागना चाह रही हूँ जैसे वो गाड़ी भाग रही थी। मेरी चाल हर पल बढ़ती जा रही थी और जल्द से जल्द वो दूरी लाँघकर अपने घर के दरवाजे की चौखट पर पहुंचकर सबसे पहले एक लम्बी साँस लेना चाहती थी।     मैं चल ही रही थी कि तभी मेरे पास से एक बाबूजी गुजरे, बाबूजी सर को धूप से बचाने के लिए सर पर एक सफेद गमछा लपेटे हुए थे। उनको देखकर भी यही लग रहा था कि बाबूजी भी बस किसी तरह अपने घर की वही चौखट पाना चाह रहे हैं जो मैं इस सुलगती धूप में पाने को व्याकुल थी।    बाबू जी को पास से गुजरता देख मैं कुछ ठहरी, वो 70,80 की उम्र में भी उनमें इतना जोश था कि मैं हैरान थी, मैं उनके पीछे चलते हुए उन्हें देख रही थी कि तभी मेरी मेरी नज़र उनके कुर्ते की उसी जेब पर पड़ी जिसमे कुछ सिक्के रखे थे।वे इत...