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Showing posts from October, 2017

कहाँ है तू ..... ऐ ज़िंदगी

                           महकती थी बहकती थी पर ना जाने क्यूँ कुछ दिनों से  ऐसा लगता है  कि जैसे कहीं ठहर सी   गई है ज़िंदगी ....  न जाने कहाँ जाकर ठहर  गई है ....  कुछ पता नहीं  😥    .....  कुछ कहकर नहीं गई ,  कब आयेगी   ये बताकर भी नहीं गई . इतने दिनों से चलते हुए शायद थक गई होगी थोड़ा ..... इसीलिए ठहर गई होगी . पर अब तो आ जाना चाहिए था उसको अब तो दिन बहुत हो गये अब तो ख़ुद की साँसे भी डराने लगी हैं मुझे .       सम्भालती हूँ ख़ुद को बहुत मगर मन की आशा और निराश होती चली जा रही है . मेरे आँगन की देहलीज पर फ़फ़कता  हुआ दीपक मुझे और बेचैन कर रहा है.  उसकी फ़फ़कती हुई लौ ऐसे बार-बार डराती है मुझको कि मुझे बस ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे ज़िंदगी चली आ रही हो और मैं इतनी सी उम्मीद को पाकर हर बार ख़ुशी की आँधियों में उड़ने लगती हूँ मगर अफ़सोस .... वो ख़ुशी की आँधी बस कुछ ही क्षणों की मेहमान होती है . मैं सोचती हूँ सम्भाल लूँ ख़ुद को ...