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Showing posts from April, 2017

सिमट सा गया बच्चों का बचपन

               कितना अच्छा होता है वो बचपन कितनी खुशहाली होती है. मानो कोई फ़िक्र तो होती ही नहीं है साथ ही साथ में अपनी वो सभी मन्मर्जियाँ होती हैं जो शायद अब नही हो पाती हैं.             अब सोंचते हैं तो हँसे बिना नहीं रह पाते की जब हम खेलते थे वो खाना पकाना. उन छोटे छोटे प्लास्टिक के बर्तनों में झूठ मूठ का खाना बनाते थे फिर उसको बड़े ही चाव से खाते थे फिर बस यही लगता था की इस खाने से स्वादिस्ट खाना हमे आजतक कोई मिला नही. सारे गुण सारे तत्व सब इसी खाने में समां गए  है. सच में क्या कहें .... बहुत याद आती है उन सभी खेलों की जो हम लोगो के फेवेरेट होते थे , गुडिया खेलना , इक्कल दुक्कल , आईस पाइस और सबसे ज्यादा पसंदीदा खेल हम लोगों का 'खाना पकाना' जिसे हम कहते थे चुक्कू पकाना भी कहते थे         जब आजकल के बच्चों को देखते हैं तो उनमे सब बदलाव नजर आते हैं ये बच्चे वो खेल क्यों नहीं खेलते जो हम खेला करते थे, क्या आजकल के बच्चे हमसे ज्यादा स्मार्ट हो गये हैं जो हम लोगों की तरह मिटटी में खेलना या...

बुढापे की हार

            कहना बिलकुल गलत नहीं होगा की जैसे जैसे इंसान की उम्र बढती जाती है अर्थात वो जैसे ही बुढ़ापे की ओर अग्रसर होने लगता है उसमे वो आपा जिसे हम लालच कह सकते हैं न जाने कहाँ से आ जाता है. हर चीज से उसका लालच बढ़ता ही जाता है. वो घर की हर एक चीज को सहेजकर रखने के आदी बन जाते हैं. उनमे वो सोंच और समझ घर बना लेती है की कोई भी चीज फेंको मत, भले ही वो कबाड़ ही क्यों न हो, कबाड़ भी वो घर से बाहर निकलने नही देते. उस कबाड़ को सहेजकर रखना उनकी आदत में शुमार हो जाता है.             अब अगर ये कहें कि क्यों वो हर चीज को सहेजकर रखना चाहते हैं तो ये कहना भी गलत नहीं होगा की उस हर चीज में उनको वो अपनी झलक दिखाई पड़ती है जो उनके द्वारा लायी या बनाई गयी होती है जिसे वो फेंकने से इंकार करते रहते हैं. उनसे बगैर पूछे अगर कोई सामान घर से बाहर निकाल दो तो वो सारा घर सर पर उठा लेते हैं और कभी कभी तो उनका गुस्सा काफी हद पार कर जाता है जिस पर काबू पाना और उनको संभालना मुश्किल हो जाता है.         लालच बढ़ने के साथ साथ उनमे यादास्...

बेटी का ब्याह

        बेटी का ब्याह करने का सपना अपने मन में लिए हर माँ बाप जी रहा होता है. वही माँ बाप अपनी बेटी का ब्याह करने के बाद अपने आपको धन्य समझने लगता है क्यूंकि उनकी लाडो अब किसी और के घर की मालकिन बनने तथा किसी और का घर सम्भालने को तैयार होती है. यही सोंचकर माँ बाप भी अपनी बेटी को ख़ुशी ख़ुशी विदा कर देते हैं.   ठीक ही कहा गया है की -  आंसूओं की एक बूँद सी होती हैं बेटियां  दो दो कुलों के बोझ को ढोती हैं बेटियां  बोये जाते हैं बेटे पर उग आती हैं बेटियां  हीरा अगर है बेटा तो मोती है बेटियां   आइये जनता हैं की एक बेटी का ब्याह किन रस्मों के साथ पूर्ण हो पाता है -                                                                                                   ...

माँ

              क्या तुमने मुझसे कुछ कहा था माँ               मैं सुन न सकी तेरी वो आवाज                शायद मैं खोई थी कहीं                या फिर बह गई थी कहीं                कि मुझे महसूस तो हुआ                 पर मैं सुन न सकी तेरी वो आवाज                 क्या तुमने मुझसे कुछ कहा था माँ                 थी तो मैं यहीं तेरे पास                 पर आँचल में तेरे सोने लगी थी                 सपनों की बगिया सजाने लगी थी                 कुछ गूँज सी सुनाई दी थी मुझे                 पर मैं सुन न सकी तेरी वो आवाज  ...