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सिमट सा गया बच्चों का बचपन



               कितना अच्छा होता है वो बचपन कितनी खुशहाली होती है. मानो कोई फ़िक्र तो होती ही नहीं है साथ ही साथ में अपनी वो सभी मन्मर्जियाँ होती हैं जो शायद अब नही हो पाती हैं.

            अब सोंचते हैं तो हँसे बिना नहीं रह पाते की जब हम खेलते थे वो खाना पकाना. उन छोटे छोटे प्लास्टिक के बर्तनों में झूठ मूठ का खाना बनाते थे फिर उसको बड़े ही चाव से खाते थे फिर बस यही लगता था की इस खाने से स्वादिस्ट खाना हमे आजतक कोई मिला नही. सारे गुण सारे तत्व सब इसी खाने में समां गए  है. सच में क्या कहें .... बहुत याद आती है उन सभी खेलों की जो हम लोगो के फेवेरेट होते थे , गुडिया खेलना , इक्कल दुक्कल , आईस पाइस और सबसे ज्यादा पसंदीदा खेल हम लोगों का 'खाना पकाना' जिसे हम कहते थे चुक्कू पकाना भी कहते थे
        जब आजकल के बच्चों को देखते हैं तो उनमे सब बदलाव नजर आते हैं ये बच्चे वो खेल क्यों नहीं खेलते जो हम खेला करते थे, क्या आजकल के बच्चे हमसे
ज्यादा स्मार्ट हो गये हैं जो हम लोगों की तरह मिटटी में खेलना या भागना पसंदनहीं करते क्यूंकि अब वो टीवी में एक कार्टून देखना और मोबाइल में गेम खेलना पसंद करते हैं. पर क्या ये सही है
 इस तरह एक जगह बैठ कर गेम खेलने से या टीवी
 देखने से उनका मानसिक विकास तो हो रहा है पर
 क्या शारीरिक विकास उस तरह से हो पा रहा है जो
 खेलने कूदने से होते है.
                  कितना अच्छा होता है ये बचपन न जमाने की फिकर ना ही कोई शर्म कि लोग क्या कहेंगे. हम कह सकते हैं की आज ये वक़्त आ गया है की खेल खिलौने तो हर बच्चे के पास होते हैं बल्कि उनके पास हमसे कहीं ज्यादा ढेरों खिलौने होते हैं पर शायद आज के बच्चों के पास वक़्त नही है उनको खेलने का और ना ही उनका इंटरेस्ट रहा है इन खेलों में. अब तो लड़की हो या लड़का बस एक गेम खेलना चाहते है है वो है विडियो गेम.वो गेम कई तरह के हो सकते हैं या तो वे फाइट वालेहोते हैं या फिर वो रेस वाले होते हैं. क्यूंकिआज हर घर में हर एक सदस्य के पास एक स्मार्ट
फ़ोन जरूरत होता है जिसमे वे गेम खेला करते हैं.
          एक आंकलन के मुताबिक सबसे ज्यादा स्मार्ट फ़ोन भारत में यूज़ किये जा रहे हैं. जब आज हमारा पूरा  भारत ही समार्ट बन गया है तो भारत का हर एक बच्चा स्मार्ट कैसे नही होगा. जिन बच्चों के घरों में स्मार्ट फ़ोन नही हैं उनके लिए भी इस प्रकार के गेम खेलना कोई बड़ी बात नहीं रही क्यूंकि अब जगह जगह पर गेम पार्लर खुल गए हैं जिनमे जाकर बच्चे अपनी पसंद का गेम खेलते हैं और घंटे के हिसाब से पेमेंट करते हैं. आज गेम पार्लर को लोग एक अच्छे बिजनेस के रूप में देखने लगे हैं .
          जब बच्चों को स्कूल जाते हुए देखती हूँ तो दिखता है की बच्चों की पीठ पर उनके वजन से अधिक वजन का तो उनका बैग होता है, ऐसा क्या खास होता है उस बैग में जो वो अपनी पीठ पर लादकर हँसते मुस्कुराते हुए चले जाते है. इतना कुछ खास हमारी बैग मे तो नही होता था. केंद्र सरकार इस ओर काम कर रही है की बच्चों की किताबों में से कुछ भाग कम किया जाये.और उनका कुछ भर हल्का किया जाये. सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चों का जीवन तब होता है जब उनको बोर्डिंग में डाल दिया जाता है क्यूंकि महंगाई इतनी है की माँ बाप दोनों ही कमाना चाहते हैं ताकि उनके बच्चों की परवरिश अच्छे से हो जाये अगर वो दोनों कमाने की सोचते भी है तो सबसे पहले उनको ये सोचना होता है की बच्चों की परवरिश कैसे होगी क्यूंकि आज हर परिवार एकांकी परिवार में ही रहना चाहता है जहाँ पर घर में उनके परिवार के सदस्यों के सिवा और कोई सदस्य नहीं होता है. फिर मजबूरी में उनको अपने बच्चे को बोर्डिंग स्कूल में डालना होता है  जहाँ पर उनके बच्चे की पढाई के साथ साथ उनकी देखभाल भी होती रहती है उनका पूरा ध्यान दिया जाता है वहां पर, पर वहां उनको वो आजादी नहीं मिल पाती है जो उनको अपने घर में मिलती है वो बंधे बंधे से रहने लगते हैं सिमट सा जाता है उनका जीवन. वो प्यार वो दुलार कितना मिस करते होंगे वे जो उनको घर में मिलता है. आज वक़्त इतना बदल गया है की खुद माँ बाप के पास समय नही है अपने बच्चों के लिए जो उनकी परवरिश पर ध्यान दे पाए और उनको वो माहौल दे पायें जो हम लोग जी चुके हैं. यही कारन है की सिमट सा गया है आजकल के बच्चों का जीवन .

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