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पहली मुलाकात

   इंतज़ार था मुझे उस सुहानी सी शाम का जब उस शाम की प्यारी सी छाँव में मैं इंतज़ार करूँगी उनका। वो शाम मुझे अपने आगोश में करने को बेकरार तो बहुत होगी मगर मेरा हुस्न तो किसी और के दीदार की चाहत में तड़प रहा होगा। मेरी आँखों में वो इंतज़ार की प्यास मुझे और भी ज्यादा शर्मसार कर रही होगी।
  आज वो शाम आ गई थी जब मैं अपनी ख़ुशी किसी और के साथ बाँटने को राज़ी न थी। मैं ख़ुद में सिमटती सी जा रही थी जैसे कुछ अनकहे से अल्फ़ाज़ मेरे नाज़ुक से मन पर कहर बरसा रहे हों, कुछ कहने को ललकार रहे हों। मगर इन होंठो ने तो एक दूसरे को इस कदर जकड़ रखा था जैसे कि बरसों से मिलन की प्यास में तड़प रहा कोई प्रेमी।
  उस मुलाकात का तो कुछ अलग ही अंदाज था जब सितारों से ज़र्द रात उस अंधकार के आंगन में अपना डेरा बसाने जा रही थी तो जुगनू भी पेड़ों पर अपना समां बाँधने को बेकरार थे और रात का अंधेरा अपने साथ कुछ खुशियाँ कुछ नाज़ुक सी खामोशियाँ ला रहा था। 

जैसे ही मैं उस शाम की नशीली सी छाँव में उनका साथ पाकर खिलखिला रही थी मानो उतनी ही तेजी से चँदा की चाँदनी चमकती जा रही थी।

 ये पहली मुलाकात की वो साजिश थी जो मुझे अपनी कैद में कर चुकी थी। उस कैद से मैं आजाद तो होना चाह रही थी मगर उनका वो साथ मुझे उस कैद से दूर जाने की इजाज़त न देता था। वो अंधेरे की तीव्रता ही थी जो मेरा मुख तक उनको दिखाने को राज़ी न थी जो उनकी बेचैनी को और ज्यादा उकसाती जा रही थी। चाँद भी बादलों में छिपकर कभी उन प्रकाशमयी किरणों से मेरे मुख पर प्रकाश डाल देता तो मानों उन्हीं क्षणों में हम दोनों एक दूसरे को इस कदर निहारते जैसे प्यासा कुएँ को निहार रहा हो। मेरी आँखें उनकी निहारती हुई आँखों में खो जाना चाहती थीं मगर रात का अंधेरा उन पर पहले ही अपना रौब जमा चुका था। उनके हाथों में लिए मैं अपना हाथ उनमें डूब चुकी थी। उनके कंधे पर सर रखकर उनके जिस्म की हर खुशबू से मैं ख़ुद को रंग लेना चाहती थी। बस एक यही मेरे पागल मन की ख़्वाहिश थी .... ये पल ये चाँद तारे ये अँधेरा ये रोशनी सब कुछ यहीं पर थम जाये और मैं उनकी बाँहो में खोकर उनके साथ सारी ज़िन्दगी एक पल में जी लूँ।

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