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एक दस्तक ज़िन्दगी की

स्तब्ध हूँ हैरान हूँ
दुनिया की इन रस्मों से
आज भी अंजान हूँ
न जोश है न प्यास है
न कुछ कह रहा एहसास है
धैर्य है और आस है
एक अपना अलग संसार है
फिर क्यूँ अचानक से मुझसे
कोई कह रहा कुछ ख़ास है
उस रौशनी से गुलज़ार रौशनदान से
कोई दे रहा आवाज़ है
लग रहा है ऐसा जैसे
कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है
वो आँचल पकड़कर मुझको बुलाती है






उन सो चुके जज़्बात को
कुछ सुरीले मधुर अल्फ़ाज़ से
 नग्में सुनाती है
कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है
मैं थी कहीं ख़ामोश सी
कुछ बेचैन सी बेताब सी
ज़िन्दगी के बदलते रंग में
मैं रंगती आसमान सी
फिर से अचानक यूँ लगा
वो बाँहों के झूले में
मुझको झुलाती है
कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है ।।

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