वो शीतल सी लहर की आवाज ऐसे ढक रही थी मुझको जैसे खुले आसमां में बरसती मीठी सी ओस, वो गाने की धीमी सी धुन कुछ कह रही थी मुझसे, जैसे कोयल की मीठी बोली में कोई अलपती सी राग हो। वो मेरे मन का कुछ ना बोलना, वो मेरी आँखो में कुछ सपनों का होना। ये सब मेरे जज़्बातों की वो शाम थी जो मुझपर कहर ढा रही थी। खुदपर काबू पाने को ललकार रही थी। मगर मेरी वो मासूमियत तो मुझपर फ़िदा हो गयी थी जो आज इस ढलती हुई शाम के साथ मेरा बहुत कुछ ले जाने को तैयार थी।
इस अकेलेपन की चादर में मैं लिपटती सी जा रही थी, वो चादर की नर्म सी परत बार-बार ढक रही थी मुझको, मेरे सपनो को जगा रही थी और मेरी खामोशी को और भी ज्यादा खामोश करने की कश्मकश में लगी हुई थी। मगर वो बेईमान रात आज और ज्यादा बेईमान हो गई थी, मानों कुछ ही अल्फाजों में सब कुछ लूट लेगी मेरा। मगर मेरी तन्हाई उस बेईमान रात पर फ़िदा हो गई और मुझको अपने आगोश में करके उस सफर पर चल दी थी जहां पर न मंजिल थी न किनारा। बस एक उम्मीद थी उस रात में आने वाले उस कहर की, मगर अब तो कहर ने भी बरसाना छोड़ दिया था। बरसते हुये बादलों ने भी मेरी ओर से अपना रुख बदल दिया था।
अब तो दूर बैठा चाँद भी गुफ्तगूं नही करता मुझसे, मेरे हुस्न ए दीदार को तो शामें बीत गईं। रात का अँधेरा और डराता है मुझे, अपनी उस नशीली आँखो से सताता है मुझे।
मुझे अपने दिल की कहानी अब कहनी ही पड़ेगी उनसे, शायद वो ही मुझपर रहम खाकर मुझे पनाह दे दें .......
सुनो ? आज रात आओगे क्या तुम सपने में मेरे , रस्ता देखूँगी तुम्हारा ।
इंतज़ार था मुझे उस सुहानी सी शाम का जब उस शाम की प्यारी सी छाँव में मैं इंतज़ार करूँगी उनका। वो शाम मुझे अपने आगोश में करने को बेकरार तो बहुत होगी मगर मेरा हुस्न तो किसी और के दीदार की चाहत में तड़प रहा होगा। मेरी आँखों में वो इंतज़ार की प्यास मुझे और भी ज्यादा शर्मसार कर रही होगी। आज वो शाम आ गई थी जब मैं अपनी ख़ुशी किसी और के साथ बाँटने को राज़ी न थी। मैं ख़ुद में सिमटती सी जा रही थी जैसे कुछ अनकहे से अल्फ़ाज़ मेरे नाज़ुक से मन पर कहर बरसा रहे हों, कुछ कहने को ललकार रहे हों। मगर इन होंठो ने तो एक दूसरे को इस कदर जकड़ रखा था जैसे कि बरसों से मिलन की प्यास में तड़प रहा कोई प्रेमी। उस मुलाकात का तो कुछ अलग ही अंदाज था जब सितारों से ज़र्द रात उस अंधकार के आंगन में अपना डेरा बसाने जा रही थी तो जुगनू भी पेड़ों पर अपना समां बाँधने को बेकरार थे और रात का अंधेरा अपने साथ कुछ खुशियाँ कुछ नाज़ुक सी खामोशियाँ ला रहा था। जैसे ही मैं उस शाम की नशीली सी छाँव में उनका साथ पाकर खिलखिला रही थी मानो उतनी ही तेजी से चँदा की चाँदनी चमकती जा रही थी। ये पहली मुलाकात की वो...
Nice wordings' dear👍😒..full thoughtful
ReplyDeleteThanks dear
ReplyDeleteAwesome ..
ReplyDeleteThanks
ReplyDeleteबहुत बेहतरीन😊
ReplyDeleteThanks dear
Deleteलिखते रहो शुभकामनायें
ReplyDeleteधन्यवाद सर ...
DeleteVery nice dear ..keep growing :)
ReplyDeleteThanks priya
DeleteBada bechain sundar lekh....Keep it up.
ReplyDeleteThank u ma'am
DeleteNice
ReplyDeleteThanks
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