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सिक्कों सा खनकता बचपन

 
     बाज़ार में छाई हुई हर ओर की रंगीनियां मुझे लुभा रही थीं और अपने पास बुलाने को बेबस कर रही थीं। मगर उस गर्मी की सुलगती धूप में मैं चली जा रही थी। उस सड़क की गरमाहट मुझे और जला रही थी। पास निकलने वाली गाड़ियाँ मुझे ऐसे दिख रही थी जैसे कि मैं हर एक गाड़ी का पीछा कर रही हूँ और इस कदर भागना चाह रही हूँ जैसे वो गाड़ी भाग रही थी। मेरी चाल हर पल बढ़ती जा रही थी और जल्द से जल्द वो दूरी लाँघकर अपने घर के दरवाजे की चौखट पर पहुंचकर सबसे पहले एक लम्बी साँस लेना चाहती थी।

    मैं चल ही रही थी कि तभी मेरे पास से एक बाबूजी गुजरे, बाबूजी सर को धूप से बचाने के लिए सर पर एक सफेद गमछा लपेटे हुए थे। उनको देखकर भी यही लग रहा था कि बाबूजी भी बस किसी तरह अपने घर की वही चौखट पाना चाह रहे हैं जो मैं इस सुलगती धूप में पाने को व्याकुल थी।

 
 बाबू जी को पास से गुजरता देख मैं कुछ ठहरी, वो 70,80 की उम्र में भी उनमें इतना जोश था कि मैं हैरान थी, मैं उनके पीछे चलते हुए उन्हें देख रही थी कि तभी मेरी मेरी नज़र उनके कुर्ते की उसी जेब पर पड़ी जिसमे कुछ सिक्के रखे थे।वे इतना तेज चल रहे थे कि उनके कुर्ते की जेब में रखे कुछ सिक्के बार बार उसमें उछल कूद कर रहे थे मानो इस कदर वे आपस में लड़ रहे थे की सबसे पहले बाहर कौन निकलेगा।
     यह देखकर मुझे अपना वही बचपन याद आ गया जब आप मेरा हाथ पकड़कर मुझे टहलाने ले जाया करते थे बाबूजी। तब आपके कुर्ते की जेब भी बिल्कुल उसी तरह भरी हुआ करती थी जैसे कि आज उन वाले बाबूजी की थी।
   आपको पता है कि जब मैं आपके साथ आपकी उंगली पकड़कर टहलने जाया करती थी तो मेरी नज़र बाबूजी आपके कुर्ते की उसी जेब पर रहती थी जिसमें वो चंद सिक्के रखे होते थे, उन सिक्कों की खनखनाहट मुझे अपनी ओर बुलाती रहती थी और मुझे उन्हें पाने की चाहत में तड़पाती रहती थी, पर क्या मजाल कि कोई सिक्का बाहर निकल  जाये। बाहर तो वही निकल पाता था और चैन से किसी दूसरे के हाथ में जाकर उछलकूद कर पाता था जिसको कि आप बाहर लाना चाहते थे बाबूजी। उनमें से कभी कभी किसी सिक्के का नसीब जाग जाया करता था जिसको आप मेरी हथेली पर रख दिया करते थे, वो नन्ही सी मासूम सी हथेली उस प्यार और उत्साह से भरे सिक्के को पाकर ख़ुशी से लाल हो जाया करती थी।



आज तो पहले से भी ज़्यादा सिक्के हो गए हैं बाबूजी। पता है आपको अब तो दस का सिक्का भी आ गया। उस वक़्त जब आप मेरी हथेली पर पचास पैसे का सिक्का रख दिया करते थे तब मैं अपनी उस हथेली को निहारती और उसे देखकर ख़ुशी से गोल गोल घूमने लगती थी। अगर आज आप मेरी हथेली पर वो दस का सिक्का रख देते तो मेरे पाँव तो ख़ुशी से ज़मीन पर ही न होते। मेरी इस हथेली को आज भी उसी सिक्के को पाने की चाहत है जो कि आपके कुर्ते की जेब से निकला हो।
    आज सबकुछ है बाबूजी और पहले से कहीं बेहतर है मगर अब एक सबसे बड़ी कमी हो गई है वो ये है कि अब आप नहीं हैं बाबूजी ।



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