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Showing posts from August, 2018

ये कैसा रक्षावचन

समाज में दरिंदगी दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। हर रोज एक नई लड़की का बलात्कार हो रहा है। दुनिया में इतनी गंदगी फैल चुकी है कि अब भाई बहन के रिश्ते को भी शक ने घेर लिया है। क्या भाई बह...

दिखावे में रंगता समाज

सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं .... आज बदलते वक़्त के साथ 15 अगस्त का जायका भी बदल गया है। स्कूलों में लड्डू इमरती और सुहाल कि जगह अब चॉकलेट और टॉफी ने ले ली है। इसे बाज़ारीकरण ही कहेंगे, जब एक मिठाई पसंद देश में कुछ मीठा चॉकलेट खाकर किया जा रहा है। आज समय के साथ राष्ट्रीय पर्व मनाने के तरीकों में भी बदलाव आया है। वो दिन अनमोल थे, जब बच्चे लड्डू पाने के लालच में 15 अगस्त को स्कूल जाना नहीं भूलते थे। जिनको इस दिन का मतलब तक नहीं पता था उनको ये पता होता था आज स्कूल में लड्डू बटेंगे। तब न इतनी टेक्नोलॉजी थी और न ही दिखावे से रंगा बाज़ारीकरण। तब चॉकलेट खाने को शायद ही कभी मिल पाती थी। वो स्कूल में मिलने वाले मोतीचूर के लड्डू खाये हुए अरसा हो जाता था। आज जिन स्कूलों में टॉफी, चॉकलेट बांटने का प्रचलन हो गया है वहाँ के बच्चों के मन पहले से ही चॉकलेट और टॉफी से भरे रहते हैं। जो स्नेह और प्यार मिठाई या लड्डू खाने से मिलता है वो चॉकलेट में कहाँ। ये आज के उभरते सितारे हैं इनकी पसंद को क्या कहें। इनको जिधर ले जायेंगे ये चले जायेंगे। नई पीढ़ी के जितने भी स्कूल अंग्रेजी माध्यम...

एक दस्तक ज़िन्दगी की

स्तब्ध हूँ हैरान हूँ दुनिया की इन रस्मों से आज भी अंजान हूँ न जोश है न प्यास है न कुछ कह रहा एहसास है धैर्य है और आस है एक अपना अलग संसार है फिर क्यूँ अचानक से मुझसे कोई कह रहा कुछ ख़ास है उस रौशनी से गुलज़ार रौशनदान से कोई दे रहा आवाज़ है लग रहा है ऐसा जैसे कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है वो आँचल पकड़कर मुझको बुलाती है उन सो चुके जज़्बात को कुछ सुरीले मधुर अल्फ़ाज़ से  नग्में सुनाती है कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है मैं थी कहीं ख़ामोश सी कुछ बेचैन सी बेताब सी ज़िन्दगी के बदलते रंग में मैं रंगती आसमान सी फिर से अचानक यूँ लगा वो बाँहों के झूले में मुझको झुलाती है कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है ।।