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मन का दर्पण

   
           कैसा है ये मन का दर्पण
           पता नहीं क्या कहता है
            खुली किताब कलम को लेकर
            सपने लिखता रहता है
            खोये सपने ख्वाब सुहाने
            सब कुछ सहता रहता है
                        पंख लगाकर पंछी स्वर में
                        गीत सुनाता रहता है
                        मन की एक मुस्कान सुहानी
                        लेकर चलता रहता है
                        कैसा है ये मन का दर्पण
                        पता नहीं क्या कहता है ....
                        ख्वाबों की परछाईं में ये
              स्वप्न दिखाता रहता है
              नहीं ठिकाना पल में इसका
              आता जाता रहता है
              मेघों के संग आसमान में
              सपने बुनता रहता है
              बिखर गये जो मन के सपने
              लेखा जोखा करता है
                           कैसा है ये मन का दर्पण
                           पता नहीं क्या कहता है
                           खुली किताब कलम को लेकर
                           सपने लिखता रहता है !!

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