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अनोखी देशभक्ति

आज़ादी की 72वीं वर्षगांठ थी। सुबह से ही चारों ओर चहल पहल थी। स्कूल के बच्चे स्कूल जा रहे थे मगर वो पीठ पर स्कूल का बैग लादकर नहीं अपने हाथों में एक झंडा लिए थे। ये झंडा उनका देशप्रेम दर्शाता था। सारा शहर दुल्हन सा सजा था जिसका नज़ारा रात में ही देखते बनता था। ऑफिस जाने वाले निकल रहे थे। सड़कों पर रोज़ से ज्यादा रौनक थी। घरों में बैठे बुजुर्ग टीवी पर मोदी जी का भाषण सुनने में व्यस्त थे तो कोई अपने बच्चे के स्कूल उसका डांस देखने जा रहा था। दूसरी ओर सोशल मीडिया भी देशभक्ति से भर चुका था। हर दिन से अलग आज का दिन था। मन में ढेरों खुशियाँ थीं मगर सिर्फ एक दिन की। दूसरा दिन होते ही सब पहले जैसा हो जाता। 


एक दिन के लिए सबकी देशभक्ति जाग गई थी। सवाल तो बस मन में ये उठ रहा था ये देशभक्ति महज एक दिन की क्यूँ? उसके बाद, उसके बाद ये देश किसी और का हो जाता है क्या? या फिर तुम ही इसके वासी नहीं रहते? तब किसी को परवाह नहीं रहती देश मे क्या हो रहा है? कोई सीख याद नहीं आती, कचरा न फैलायें, महिलाओं पर अत्याचार न करें, सबको अपनी माँ बहन समझें। ये सब महज एक दिन के लिए क्यूँ याद रहता है उसके बाद हम भूल क्यूँ जाते हैं। हम हर दिन इसको अपने साथ क्यूँ नहीं रखते। जैसा हम एक दिन के लिए सोंचते हैं वैसा हम हर दिन क्यूँ नहीं सोंचते। देश बदलने के सपने देखते हैं खुद को बदल लें, नहीं सोंचते। अगर हम अपनी सोच बदल लें तो देश बदलने में सदियां नहीं लगेंगी।

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पापा की याद

    बात उस समय की है जब मैं अपनी पढाई करने के लिये अपने घर से दूर एक हॉस्टल में आकर रहने लगी थी इससे पहले मैं अपने घर से इस तरह से कभी दूर नही हुई थी , ऐसे में घर की याद आना तो स्वाभाविक था , घर की याद करते हुए मैं अक्सर रोने लगा करती थी तभी मैंने अपने पापा की याद करके कुछ लिखा था जो आज मैं फादर्स डे के अवसर पर उनको सुनना चाहूँगी ..... love u so much papa n happy father's day   पापा जब तुम आओगे और मुझको गले लगाओगे कहीं रो न दूँ मैं तुम्हें देखकर ये सोंच के तुम घबराओगे पापा जब तुम आओगे .... अपनी लाडो को यूँ देखकर  प्यारी मुस्कान तो लाओगे  गर आ भी गये दो आँसू छल से  फिर मुझसे नजर चुराओगे  पापा जब तुम आओगे ..... क्या लाओगे साथ तुम अपने  मेरे लिये कुछ खाने को  बस दे देना एक मुस्कान सुहानी  तुम अपना हाल बताने को  माँ कैसी है ये बतलाना  कैसा है गाँव मेरा  ठीक नहीं होगा फिर पापा  गर मुझसे कुछ छुपाओगे !! पापा जब तुम आओगे                ...

पहली मुलाकात

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एक दस्तक ज़िन्दगी की

स्तब्ध हूँ हैरान हूँ दुनिया की इन रस्मों से आज भी अंजान हूँ न जोश है न प्यास है न कुछ कह रहा एहसास है धैर्य है और आस है एक अपना अलग संसार है फिर क्यूँ अचानक से मुझसे कोई कह रहा कुछ ख़ास है उस रौशनी से गुलज़ार रौशनदान से कोई दे रहा आवाज़ है लग रहा है ऐसा जैसे कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है वो आँचल पकड़कर मुझको बुलाती है उन सो चुके जज़्बात को कुछ सुरीले मधुर अल्फ़ाज़ से  नग्में सुनाती है कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है मैं थी कहीं ख़ामोश सी कुछ बेचैन सी बेताब सी ज़िन्दगी के बदलते रंग में मैं रंगती आसमान सी फिर से अचानक यूँ लगा वो बाँहों के झूले में मुझको झुलाती है कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है ।।