कहना बिलकुल गलत नहीं होगा की जैसे जैसे इंसान की उम्र बढती जाती है अर्थात वो जैसे ही बुढ़ापे की ओर अग्रसर होने लगता है उसमे वो आपा जिसे हम लालच कह सकते हैं न जाने कहाँ से आ जाता है. हर चीज से उसका लालच बढ़ता ही जाता है. वो घर की हर एक चीज को सहेजकर रखने के आदी बन जाते हैं. उनमे वो सोंच और समझ घर बना लेती है की कोई भी चीज फेंको मत, भले ही वो कबाड़ ही क्यों न हो, कबाड़ भी वो घर से बाहर निकलने नही देते. उस कबाड़ को सहेजकर रखना उनकी आदत में शुमार हो जाता है.
अब अगर ये कहें कि क्यों वो हर चीज को सहेजकर रखना चाहते हैं तो ये कहना भी गलत नहीं होगा की उस हर चीज में उनको वो अपनी झलक दिखाई पड़ती है जो उनके द्वारा लायी या बनाई गयी होती है जिसे वो फेंकने से इंकार करते रहते हैं. उनसे बगैर पूछे अगर कोई सामान घर से बाहर निकाल दो तो वो सारा घर सर पर उठा लेते हैं और कभी कभी तो उनका गुस्सा काफी हद पार कर जाता है जिस पर काबू पाना और उनको संभालना मुश्किल हो जाता है.
लालच बढ़ने के साथ साथ उनमे यादास्त की कमी हो जाती है तथा उनकी भाषा और बातचीत में बदलाव देखने को मिलने लगते हैं. उनका व्यक्तित्व पूर्ण रूप से बदल जाता है. ये एक डिमेंशिया नामक बीमारी के लच्छण होते हैं. जिसे बुढ़ापे का लालच या केन्द्रीयकरण कहा जाता है. यह मानसिक क्रिया में आया एक बदलाव होता है जो बुजुर्गों को इससे आगे बढ़कर सोचने नही देता. यह बीमारी मनुष्य के सोचने समझने की छमता में कमी करती है जिसमे वो अपने सामने की चीजें तो जान लेते हैं मगर आगे की बातें नही सोच पाते हैं.
इन सभी बीमरियों में से अगर इंसान के अन्दर कोई ये एक बीमारी देखने को मिल जाती है तो वह डिमेंशिया नामक बीमारी की श्रेणी में गिना जाने लगता है.
1. केन्द्रीयकरण और ध्यान देने की छमता में तीव्रता2. बातचीत या भाषा में बदलाव होना
3. यादाश्त की कमी
4.तर्क देने और निर्णय लेने की छमता में कमी आदि.
न्यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ. मंजरी त्रिपाठी कहती हैं कि
यह एक ऐसा मानसिक असंतुलन रोग है जिसमे इंसान तर्क देने या समझने के काबिल नहीं रह जाता है इस रोग में कमी न आ पाने का प्रमुख कारन यही है की जब व्यक्ति मध्यम या अग्रिम अवस्था में होता है तब रोग का निदान या तो हो जाता है या फिर नहीं हो पाता है. इस कारन परिवार वाले यह नही जान पाते हैंकी वो देखभाल कैसे करें और इलाज किस तरह से कराएँ.ऐसीअवस्था में हमें सबसे ज्यादाआवश्यकता होती है बुजुर्गों के साथ नम्र व्यवहार करने की. जैसा कहा जाता है की बूढ़े और बच्चे बराबर होते हैं उसी प्रकार से हमें बुजुर्गों के साथ बच्चों जैसा स्नेह
करने की आवश्यकता होती है. हमें उनसे सहानुभूति दिखानी चाहिए तथा उनकी हर बात कोसमझना चाहिए. ये बीमारी हमारे बुजुर्गों पर हावी होकर हमें उनसे दूर कर रही है. समाज में कई लोग तो डिमेंशिया को उम्र वृधि का एक अंग मान लेते हैं इसी कारण ध्यान नहीदेते हैं यह बीमारी अधिकांशतः 60 से 65 वर्ष की उम्र के व्यक्तियों में देखी जाती है परन्तु अब ये बीमारी एक विशाल रूप ले रही है जो कम उम्र के व्यक्तियों में जैसे 45 से 50 या 40 तक की उम्र के व्यक्तियों में भी देखने को मिल रही है.
यदि इस बीमारी का ये रूप यूँ ही चलता रहा तो किस तरह से हमारे समाज का विकास हो सकेगा और किस तरह से व्यक्तित्व का निर्माण हो सकेगा.
Good Writeup.
ReplyDeleteThanks
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