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प्रदुम्न की याद में ...... कुछ मेरी कलम से


           कितना तड़प रही होगी वो माँ
           जिसका लाल उससे बिछड़ गया
           अँखियों के बंद झरोखों से
           अंसुओं की धार बहा गया
           
                       पागल सी वो तड़प रही
                       उसका लाल उसे मिल जाये कहीं
                                        मगर अफसोस बेरहम दुनिया का
                       या कुदरत कोई खेल खेल गया
                       जो लाल उसी का उससे लेकर
                       अपना कहकर कोई छीन गया
                       मेरा लाल मुझसे बिछड़ गया
     
          प्यारी प्यारी उसकी बोली
          ममता में आह जगाती है
          कानों में गूंज रही आवाज
          माँ माँ कहकर रुक जाती है
          आखिर क्या कसूर था मेरा
          जो मेरा लाल मुझसे जुदा किया
          ममता की हाय सताएगी
          मेरा सब कुछ तुमने छीन लिया
          हाय मेरा लाल मुझसे बिछड़ गया
  
                         अपनी सूनी गोदी लेकर
                         अब खुद को क्या समझाये वो
                         क्या बीत रही है उस माँ पर
                         कैसे किसको बतलाये वो
                         आसमान के तारों में
                         वो रोज खड़ी निहारती है
                         शायद आ जाये लाल मेरा
                         बस इतना कहकर रुक जाती है
               
               
 

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अनोखी देशभक्ति

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