सोंचती हूँ तो लगता है कितनी सुन्दर होती है उस वक़्त की जिन्दगी, हर आदमी जिसका गुलाम बना फिरता है। आज हर आदमी बस वक़्त के पीछे भाग रहा है और बस उसे पाने की लालसा में भटकता फिर रहा है। कितना खुश होता होगा वक़्त ये देखकर पर क्या कभी किसी ने वक़्त से पूछी है उसकी हालत ?
जो हरपल बस दुनिया के तानों और उलहनो में जीता है मगर फिर भी चलता रहता है। अगर किसी के पास ये वक़्त अच्छा बनकर चला जाता है तो सब इसके दीवाने हो जाते हैं और यही सोंचते हैं कि अब ये वक़्त उनके पास से कभी दूर न जाये। पर अगर यही वक़्त किसी के पास बुरा बनकर चला जाता है तो फिर वही इंसान ये सोंचने लगता है इसके बारे में कि ये कब उनके घर से वापस जाये, वे कोसने लगते हैं इस वक़्त को और दुआ करने लगते हैं कि फिर से ये वाला वक़्त कभी न आये उनके पास।
बेचारा ये वक़्त .... बड़ी अजीब होती है इसकी ज़िन्दगी। पर ये भी क्या करे अपनी आदत से जो मजबूर है कभी एक सा रह ही नही पाता।
अगर बनना है कुछ जिंदगी में
तो वक़्त की तरह बनों
जो सुबह के साथ ही
सज जाता है
दुनिया के ताने सुनने को
सुनता है समझता है
पर नहीं किसी से डरता है
अपनी धुन में बस जीता है
गिरता है और सम्भलता है
क्या मज़ाल रुक जाये कहीं
नहीं कहीं पर रुकता है
रहता है ये कभी सुनहरा
कभी बुरा हो जाता है
आखिर जीवन तो है इसका भी
हर दिन एक सा न रह पाता है
कभी तुम्हे खींचकर अपने
चारों ओर घुमाता है
कभी मुसीबत आने पर तुमको
दूर से ही समझाता है
ये वक़्त बड़ा बेईमान है
नादान कभी हो जाता है
कभी खेल खेलने हम सबके संग
पास चला ये आता है
कभी तुम्हारे पीछे छिपकर
तुम्हे बहुत उलझाता है
फिर पल में ख़ुशी तुम्हे देकर ये
तुमको खूब हँसता है
रंग दिखता दुनिया को कितने
कितने रूप बनाता है
रूप बदलकर जानें कितने
सबको ये भरमाता है
बस यही पुरानी आदत इसकी
जो कोई समझ न पाता है
ढलता नहीं दूसरों में यह
खुद में सबको ढलवाता है ।।
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