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"सत्यता"

मानव जीवन में सत्यता को स्वीकारना अपने आप में ही एक अदभुत चुनौती है चाहे वो किसी भी रूप में हो ! मनुष्य को कभी भी सत्यता से मुख नहीं मोड़ना चाहिये उसे हर रूप में स्वीकारना ही उसका मानव धर्म होना चाहिए ! यदि सत्यता को न स्वीकारोगे तो कहाँ जाओगे ? खुद से दूर या फिर इस समाज से दूर ! सत्यता से बचने के लिये भले ही तुम खुद से दूर भाग लो परन्तु सत्यता कहीं नहीं भाग सकती क्योंकि वह तो अखण्ड होती है ! उसमें कोई भी छल ,द्वन्द या द्वेष विद्घमान नहीं होता ! परन्तु मानव अपने अहंकार के रहते उसे स्वीकार नहीं पाता ! यही कारण है कि उसे मानव जीवन भी एक अभिशाप लगने लगता है !

पापा की याद

    बात उस समय की है जब मैं अपनी पढाई करने के लिये अपने घर से दूर एक हॉस्टल में आकर रहने लगी थी इससे पहले मैं अपने घर से इस तरह से कभी दूर नही हुई थी , ऐसे में घर की याद आना तो स्वाभाविक था , घर की याद करते हुए मैं अक्सर रोने लगा करती थी तभी मैंने अपने पापा की याद करके कुछ लिखा था जो आज मैं फादर्स डे के अवसर पर उनको सुनना चाहूँगी ..... love u so much papa n happy father's day   पापा जब तुम आओगे और मुझको गले लगाओगे कहीं रो न दूँ मैं तुम्हें देखकर ये सोंच के तुम घबराओगे पापा जब तुम आओगे .... अपनी लाडो को यूँ देखकर  प्यारी मुस्कान तो लाओगे  गर आ भी गये दो आँसू छल से  फिर मुझसे नजर चुराओगे  पापा जब तुम आओगे ..... क्या लाओगे साथ तुम अपने  मेरे लिये कुछ खाने को  बस दे देना एक मुस्कान सुहानी  तुम अपना हाल बताने को  माँ कैसी है ये बतलाना  कैसा है गाँव मेरा  ठीक नहीं होगा फिर पापा  गर मुझसे कुछ छुपाओगे !! पापा जब तुम आओगे                ...

Blessings for my sister ....

               रंग जाओ अब उनके रंग में                    प्रीत भरे इस जीवन में                जीवन की लहरों में छुपकर                     घूँघट के उस आँचल में                आँचल की खुश्बू में छुपकर                     रंग जाओ तुम दर्पण में                दर्पण के भीतर प्यारी सी                      झिलमिल झिलमिल सी आँखों में                आँखों के काजल से रंग लो                      या रंग लो उनके मन से खुद को                 फूलों कलियों सा प्यारा जीवन           ...

Dedicated to vartika nanda ma'am ....

तुम्हारे जज्बे को सलाम तुम्हारे सपने को सलाम तुम्हारी बातों में सिमटी हर आहट को सलाम          सलाम तुम्हारे अपनेपन को          संघर्ष भरे जीवन को          इस जीवन की कश्ती ...

मन का दर्पण

               कैसा है ये मन का दर्पण            पता नहीं क्या कहता है             खुली किताब कलम को लेकर             सपने लिखता रहता है             खोये सपने ख्वाब सुहाने             सब कुछ सहता रहता है                         पंख लगाकर पंछी स्वर में                         गीत सुनाता रहता है                         मन की एक मुस्कान सुहानी                         लेकर चलता रहता है                         कैसा है ये मन का दर्पण                       ...

मेरे भगवान

                    कैसे बताऊँ मैं तुम्हें       क्या हो तुम मेरे लिये ....               तुम ही मेरा अभिमान हो        तुम ही मेरा ईमान भी       तुम मेरे मन की सुन्दरता       तुम ही मेरे जहान हो       कैसे बताऊँ मैं तुम्हें                                                                                              मैं तो हूँ तेरा एक टुकड़ा                    तुम मेरे भगवान हो                    पूजा करती मैं हरपल तेरी              ...

सिमट सा गया बच्चों का बचपन

               कितना अच्छा होता है वो बचपन कितनी खुशहाली होती है. मानो कोई फ़िक्र तो होती ही नहीं है साथ ही साथ में अपनी वो सभी मन्मर्जियाँ होती हैं जो शायद अब नही हो पाती हैं.             अब सोंचते हैं तो हँसे बिना नहीं रह पाते की जब हम खेलते थे वो खाना पकाना. उन छोटे छोटे प्लास्टिक के बर्तनों में झूठ मूठ का खाना बनाते थे फिर उसको बड़े ही चाव से खाते थे फिर बस यही लगता था की इस खाने से स्वादिस्ट खाना हमे आजतक कोई मिला नही. सारे गुण सारे तत्व सब इसी खाने में समां गए  है. सच में क्या कहें .... बहुत याद आती है उन सभी खेलों की जो हम लोगो के फेवेरेट होते थे , गुडिया खेलना , इक्कल दुक्कल , आईस पाइस और सबसे ज्यादा पसंदीदा खेल हम लोगों का 'खाना पकाना' जिसे हम कहते थे चुक्कू पकाना भी कहते थे         जब आजकल के बच्चों को देखते हैं तो उनमे सब बदलाव नजर आते हैं ये बच्चे वो खेल क्यों नहीं खेलते जो हम खेला करते थे, क्या आजकल के बच्चे हमसे ज्यादा स्मार्ट हो गये हैं जो हम लोगों की तरह मिटटी में खेलना या...