Skip to main content

Posts

तेरे शहर में

        सुनों !! क्या तुम्हें मेरे आने का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ क्या मेरे क़दमों की आहट ने तुम्हें और बेचैन नहीं किया, तुम्हें कुछ तो महसूस हुआ होगा कि मैं यहीं हूँ तेरे पास .... तेरे शहर में ....     मैं यहीं तो हूँ तेरे पास तेरे शहर में मगर इन नज़रों ने कभी तुझे देखा नहीं इन तरसती आँखों ने तुमको ढूँढा तो बहुत मगर तुम्हारी वो एक प्यारी सी मनमोहक झलक मुझको दिखी नहीं तुम्हारी तस्वीर बसी है मन में मेरे .... मगर मैं तो तेरा दीदार चाहता हूँ तेरे इस प्यार भरे दिल से कुछ अल्फाज़ माँगता हूँ तू मुझे न सही किसी और को समझकर सामने आ जाये मेरे बस इतना सा ख़्वाब है मेरा कि मैं यहीं हूँ तेरे शहर में .....           मेरे पास से गुज़रने वाली उस हवा में मुझे तेरी ही खुशबू आती है मेरा ख्याल तो ये है कि कहीं तू हवा कि वो नर्म सी परत बनकर मुझे ढके तो नहीं है क्यूँकि मैं भी तो हूँ उसी शहर में जो हवा तुझे छूकर गुज़रती है ....   सुनो !! कब दीदार होगा तुम्हारा .... तड़प रहा हूँ तुमसे मिलने को तेरे ही शहर में ....         अपने मुख...

कहाँ है तू ..... ऐ ज़िंदगी

                           महकती थी बहकती थी पर ना जाने क्यूँ कुछ दिनों से  ऐसा लगता है  कि जैसे कहीं ठहर सी   गई है ज़िंदगी ....  न जाने कहाँ जाकर ठहर  गई है ....  कुछ पता नहीं  😥    .....  कुछ कहकर नहीं गई ,  कब आयेगी   ये बताकर भी नहीं गई . इतने दिनों से चलते हुए शायद थक गई होगी थोड़ा ..... इसीलिए ठहर गई होगी . पर अब तो आ जाना चाहिए था उसको अब तो दिन बहुत हो गये अब तो ख़ुद की साँसे भी डराने लगी हैं मुझे .       सम्भालती हूँ ख़ुद को बहुत मगर मन की आशा और निराश होती चली जा रही है . मेरे आँगन की देहलीज पर फ़फ़कता  हुआ दीपक मुझे और बेचैन कर रहा है.  उसकी फ़फ़कती हुई लौ ऐसे बार-बार डराती है मुझको कि मुझे बस ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे ज़िंदगी चली आ रही हो और मैं इतनी सी उम्मीद को पाकर हर बार ख़ुशी की आँधियों में उड़ने लगती हूँ मगर अफ़सोस .... वो ख़ुशी की आँधी बस कुछ ही क्षणों की मेहमान होती है . मैं सोचती हूँ सम्भाल लूँ ख़ुद को ...

प्रदुम्न की याद में ...... कुछ मेरी कलम से

           कितना तड़प रही होगी वो माँ            जिसका लाल उससे बिछड़ गया            अँखियों के बंद झरोखों से            अंसुओं की धार बहा गया                                    पागल सी वो तड़प रही                        उसका लाल उसे मिल जाये कहीं                                         मगर अफसोस बेरहम दुनिया का                        या कुदरत कोई खेल खेल गया         ...

वक़्त

        सोंचती हूँ तो लगता है कितनी सुन्दर होती है उस वक़्त की जिन्दगी, हर आदमी जिसका गुलाम बना फिरता है। आज हर आदमी बस वक़्त के पीछे भाग रहा है और बस उसे पाने की लालसा में भटकता फ...

शब्द से बदलती दुनिया

           दोस्तों शब्द क्या होते हैं ? कितना महत्व होता है इन शब्दों का हमारे जीवन में, क्या कभी कुछ सोचा है आपने।         जब हम अपने विचार किसी दूसरे तक पहुंचाते हैं तो उसमें हम शब्दों का सहारा लेते हैं और यही शब्द मिलकर एक वाक्य बना देते हैं। जिसको हम 'बात' कह सकते हैं, हमने तुमसे ये बात कही या तुमने हमसे वो बात कही, पर ये बात आई कहाँ से, ये बात बनी कहाँ से ? ये बात बनती है कई शब्दों को मिलाकर ।         कभी किसी बात को कहने के लिए हमें अनेक शब्दों को जोड़ना पड़ता है और कभी हम एक ही शब्द में पूरी बात कह जाते हैं । जिसके आगे शायद हमें और कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। हमारे जीवन में शब्दों का उतना ही महत्व है जितना की भाव का। कभी बिना शब्द के ही किसी दूसरे से हम अपने भाव व्यक्त कर देते हैं और कभी हम बिना भाव के ही कोई शब्द कह देते हैं ।      सच तो ये है हमको अपने भाव को व्यक्त करने के लिए शब्दों का सहारा लेना पड़ता है, शब्द के बिना भाव अधूर...

"जब तुम याद आये"

       वो शीतल सी लहर की आवाज ऐसे ढक रही थी मुझको जैसे खुले आसमां में बरसती मीठी सी ओस, वो गाने की धीमी सी धुन कुछ कह रही थी मुझसे, जैसे कोयल की मीठी बोली में कोई अलपती सी राग हो। वो मेरे मन का कुछ ना बोलना, वो मेरी आँखो में कुछ सपनों का होना। ये सब मेरे जज़्बातों की वो शाम थी जो मुझपर कहर ढा रही थी। खुदपर काबू पाने को ललकार रही थी। मगर मेरी वो मासूमियत तो मुझपर फ़िदा हो गयी थी जो आज इस ढलती हुई शाम के साथ मेरा बहुत कुछ ले जाने को तैयार थी।        इस अकेलेपन की चादर में मैं लिपटती सी जा रही थी, वो चादर की नर्म सी परत बार-बार ढक रही थी मुझको, मेरे सपनो को जगा रही थी और मेरी खामोशी को और भी ज्यादा खामोश करने की कश्मकश में लगी हुई थी। मगर वो बेईमान रात आज और ज्यादा बे ईमान हो गई थी, मानों कुछ ही अल्फाजों में सब कुछ लूट लेगी मेरा। मगर मेरी तन्हाई उस बेईमान रात पर फ़िदा हो गई और मुझको अपने आगोश में करके उस सफर पर चल दी थी जहां पर न मंजिल थी न किनारा। बस एक उम्मीद थी उस रात में आने वाले उस कहर की, मगर अब तो कहर ने भी बरसाना छोड़ दिया था...

"सत्यता"

मानव जीवन में सत्यता को स्वीकारना अपने आप में ही एक अदभुत चुनौती है चाहे वो किसी भी रूप में हो ! मनुष्य को कभी भी सत्यता से मुख नहीं मोड़ना चाहिये उसे हर रूप में स्वीकारना ही उसका मानव धर्म होना चाहिए ! यदि सत्यता को न स्वीकारोगे तो कहाँ जाओगे ? खुद से दूर या फिर इस समाज से दूर ! सत्यता से बचने के लिये भले ही तुम खुद से दूर भाग लो परन्तु सत्यता कहीं नहीं भाग सकती क्योंकि वह तो अखण्ड होती है ! उसमें कोई भी छल ,द्वन्द या द्वेष विद्घमान नहीं होता ! परन्तु मानव अपने अहंकार के रहते उसे स्वीकार नहीं पाता ! यही कारण है कि उसे मानव जीवन भी एक अभिशाप लगने लगता है !