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पहली मुलाकात

   इंतज़ार था मुझे उस सुहानी सी शाम का जब उस शाम की प्यारी सी छाँव में मैं इंतज़ार करूँगी उनका। वो शाम मुझे अपने आगोश में करने को बेकरार तो बहुत होगी मगर मेरा हुस्न तो किसी और के दीदार की चाहत में तड़प रहा होगा। मेरी आँखों में वो इंतज़ार की प्यास मुझे और भी ज्यादा शर्मसार कर रही होगी।   आज वो शाम आ गई थी जब मैं अपनी ख़ुशी किसी और के साथ बाँटने को राज़ी न थी। मैं ख़ुद में सिमटती सी जा रही थी जैसे कुछ अनकहे से अल्फ़ाज़ मेरे नाज़ुक से मन पर कहर बरसा रहे हों, कुछ कहने को ललकार रहे हों। मगर इन होंठो ने तो एक दूसरे को इस कदर जकड़ रखा था जैसे कि बरसों से मिलन की प्यास में तड़प रहा कोई प्रेमी।   उस मुलाकात का तो कुछ अलग ही अंदाज था जब सितारों से ज़र्द रात उस अंधकार के आंगन में अपना डेरा बसाने जा रही थी तो जुगनू भी पेड़ों पर अपना समां बाँधने को बेकरार थे और रात का अंधेरा अपने साथ कुछ खुशियाँ कुछ नाज़ुक सी खामोशियाँ ला रहा था।  जैसे ही मैं उस शाम की नशीली सी छाँव में उनका साथ पाकर खिलखिला रही थी मानो उतनी ही तेजी से चँदा की चाँदनी चमकती जा रही थी।  ये पहली मुलाकात की वो...

सिक्कों सा खनकता बचपन

       बाज़ार में छाई हुई हर ओर की रंगीनियां मुझे लुभा रही थीं और अपने पास बुलाने को बेबस कर रही थीं। मगर उस गर्मी की सुलगती धूप में मैं चली जा रही थी। उस सड़क की गरमाहट मुझे और जला रही थी। पास निकलने वाली गाड़ियाँ मुझे ऐसे दिख रही थी जैसे कि मैं हर एक गाड़ी का पीछा कर रही हूँ और इस कदर भागना चाह रही हूँ जैसे वो गाड़ी भाग रही थी। मेरी चाल हर पल बढ़ती जा रही थी और जल्द से जल्द वो दूरी लाँघकर अपने घर के दरवाजे की चौखट पर पहुंचकर सबसे पहले एक लम्बी साँस लेना चाहती थी।     मैं चल ही रही थी कि तभी मेरे पास से एक बाबूजी गुजरे, बाबूजी सर को धूप से बचाने के लिए सर पर एक सफेद गमछा लपेटे हुए थे। उनको देखकर भी यही लग रहा था कि बाबूजी भी बस किसी तरह अपने घर की वही चौखट पाना चाह रहे हैं जो मैं इस सुलगती धूप में पाने को व्याकुल थी।    बाबू जी को पास से गुजरता देख मैं कुछ ठहरी, वो 70,80 की उम्र में भी उनमें इतना जोश था कि मैं हैरान थी, मैं उनके पीछे चलते हुए उन्हें देख रही थी कि तभी मेरी मेरी नज़र उनके कुर्ते की उसी जेब पर पड़ी जिसमे कुछ सिक्के रखे थे।वे इत...

बहुत याद आती हो तुम

तेरा यूँ साथ चलना तेरा यूँ मुस्कुराना  मेरे हर सुख़ दुख़ को अपना कहना मुझे बहुत याद आता है मेरे माथे पर पड़ी उन सिलवटों को देखकर तेरा मुझसे कुछ पूछना मेरे लाख मना करने पर भी  तेरा मेंरे मन को पढ़ लेना अद्भुत था कभी साथ चलते चलते तेरा कुछ सोचना फिर दूर जाकर बैठकर तेरा मुझसे कुछ पूछना आज भी सब याद है कुछ नहीं भुला हूँ मैं तेरे संग बिताये हुये  हर एक पल का हिसाब  लिखा है मेरे पास कभी आओ तुम भी पढ़ो तो शायद मैं भी पढ़ लूँ थोड़ा तेरे बग़ैर दिल नहीं चाहता  उस डायरी को उठाने का मुझे भीतर तक झकझोर देती हैं तेरी वो यादें तेरी वो बातें सोचता हूँ कि हँसकर याद करूँ तुझे मग़र न जाने क्यूँ ये उदासी दूर जाती नहीं न जाने कितना पसंद आ गया हूँ मैं इसको कभी किसी छोटी सी बात पर  तेरा रोना तेरी उस उदासी भरी शक़्ल में तेरी मासूमियत छिपी होना याद करता हूँ तो  एक मुस्कान लाने को मजबूर हो जाता हूँ समझ नहीं आता  अब क्या करूँ इन यादों का इन को हँसकर याद करूँ या यूँ ही रोता रहूँ  टूट चुका हूँ मैं मै...

तेरे शहर में

        सुनों !! क्या तुम्हें मेरे आने का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ क्या मेरे क़दमों की आहट ने तुम्हें और बेचैन नहीं किया, तुम्हें कुछ तो महसूस हुआ होगा कि मैं यहीं हूँ तेरे पास .... तेरे शहर में ....     मैं यहीं तो हूँ तेरे पास तेरे शहर में मगर इन नज़रों ने कभी तुझे देखा नहीं इन तरसती आँखों ने तुमको ढूँढा तो बहुत मगर तुम्हारी वो एक प्यारी सी मनमोहक झलक मुझको दिखी नहीं तुम्हारी तस्वीर बसी है मन में मेरे .... मगर मैं तो तेरा दीदार चाहता हूँ तेरे इस प्यार भरे दिल से कुछ अल्फाज़ माँगता हूँ तू मुझे न सही किसी और को समझकर सामने आ जाये मेरे बस इतना सा ख़्वाब है मेरा कि मैं यहीं हूँ तेरे शहर में .....           मेरे पास से गुज़रने वाली उस हवा में मुझे तेरी ही खुशबू आती है मेरा ख्याल तो ये है कि कहीं तू हवा कि वो नर्म सी परत बनकर मुझे ढके तो नहीं है क्यूँकि मैं भी तो हूँ उसी शहर में जो हवा तुझे छूकर गुज़रती है ....   सुनो !! कब दीदार होगा तुम्हारा .... तड़प रहा हूँ तुमसे मिलने को तेरे ही शहर में ....         अपने मुख...

कहाँ है तू ..... ऐ ज़िंदगी

                           महकती थी बहकती थी पर ना जाने क्यूँ कुछ दिनों से  ऐसा लगता है  कि जैसे कहीं ठहर सी   गई है ज़िंदगी ....  न जाने कहाँ जाकर ठहर  गई है ....  कुछ पता नहीं  😥    .....  कुछ कहकर नहीं गई ,  कब आयेगी   ये बताकर भी नहीं गई . इतने दिनों से चलते हुए शायद थक गई होगी थोड़ा ..... इसीलिए ठहर गई होगी . पर अब तो आ जाना चाहिए था उसको अब तो दिन बहुत हो गये अब तो ख़ुद की साँसे भी डराने लगी हैं मुझे .       सम्भालती हूँ ख़ुद को बहुत मगर मन की आशा और निराश होती चली जा रही है . मेरे आँगन की देहलीज पर फ़फ़कता  हुआ दीपक मुझे और बेचैन कर रहा है.  उसकी फ़फ़कती हुई लौ ऐसे बार-बार डराती है मुझको कि मुझे बस ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे ज़िंदगी चली आ रही हो और मैं इतनी सी उम्मीद को पाकर हर बार ख़ुशी की आँधियों में उड़ने लगती हूँ मगर अफ़सोस .... वो ख़ुशी की आँधी बस कुछ ही क्षणों की मेहमान होती है . मैं सोचती हूँ सम्भाल लूँ ख़ुद को ...

प्रदुम्न की याद में ...... कुछ मेरी कलम से

           कितना तड़प रही होगी वो माँ            जिसका लाल उससे बिछड़ गया            अँखियों के बंद झरोखों से            अंसुओं की धार बहा गया                                    पागल सी वो तड़प रही                        उसका लाल उसे मिल जाये कहीं                                         मगर अफसोस बेरहम दुनिया का                        या कुदरत कोई खेल खेल गया         ...

वक़्त

        सोंचती हूँ तो लगता है कितनी सुन्दर होती है उस वक़्त की जिन्दगी, हर आदमी जिसका गुलाम बना फिरता है। आज हर आदमी बस वक़्त के पीछे भाग रहा है और बस उसे पाने की लालसा में भटकता फ...