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Showing posts from 2018

अनोखी देशभक्ति

आज़ादी की 72वीं वर्षगांठ थी। सुबह से ही चारों ओर चहल पहल थी। स्कूल के बच्चे स्कूल जा रहे थे मगर वो पीठ पर स्कूल का बैग लादकर नहीं अपने हाथों में एक झंडा लिए थे। ये झंडा उनका देशप्रेम दर्शाता था। सारा शहर दुल्हन सा सजा था जिसका नज़ारा रात में ही देखते बनता था। ऑफिस जाने वाले निकल रहे थे। सड़कों पर रोज़ से ज्यादा रौनक थी। घरों में बैठे बुजुर्ग टीवी पर मोदी जी का भाषण सुनने में व्यस्त थे तो कोई अपने बच्चे के स्कूल उसका डांस देखने जा रहा था। दूसरी ओर सोशल मीडिया भी देशभक्ति से भर चुका था। हर दिन से अलग आज का दिन था। मन में ढेरों खुशियाँ थीं मगर सिर्फ एक दिन की। दूसरा दिन होते ही सब पहले जैसा हो जाता।  एक दिन के लिए सबकी देशभक्ति जाग गई थी। सवाल तो बस मन में ये उठ रहा था ये देशभक्ति महज एक दिन की क्यूँ? उसके बाद, उसके बाद ये देश किसी और का हो जाता है क्या? या फिर तुम ही इसके वासी नहीं रहते? तब किसी को परवाह नहीं रहती देश मे क्या हो रहा है? कोई सीख याद नहीं आती, कचरा न फैलायें, महिलाओं पर अत्याचार न करें, सबको अपनी माँ बहन समझें। ये सब महज एक दिन के लिए क्यूँ याद रहता है उसके बाद हम...

आम आदमी का जीवन जीते थे शास्त्री जी

1902 का साल यूं तो आम ही था मगर वो खास तब बन गया था। जब लाल बहादुर शास्त्री जैसी शख्सियत का जन्म हुआ था। बनारस के मुगलसराय की धरती भी जश्न मना रही थी उस दिन। जब उसके यहां लाल बहादुर जैसा लाल आया था। छोटा कद सामान्य व्यक्तित्व होने की वजह से शास्त्री जी लोग को कमज़ोर समझने लगते थे। मगर शास्त्री जी ने अपनी काबिलियत से सबके मुंह बंद करवा दिए। सामान्य जीवन जीने वाले शास्त्री जी आज एक मिसाल बन चुके हैं हम सबके लिए। आज आम आदमी नाम की एक पार्टी बन चुकी है। मगर आम आदमी का जीवन जीना शायद आज भी नहीं आया किसी नेता को। आम आदमी का जीवन संघर्षों से भरा होता है। इस समाज में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो अपने सिंघासन को दरकिनार करते हुए आम आदमी की जिंदगी जीना चाहेगा। जो मिलने वाली हर सुविधा को न स्वीकार करके आम आदमी बनेगा। ऐसे ही महान थे हमारे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी। सादगी ही जिनका जीवन परिचय रहा और ईमानदारी उनका व्यक्तित्व।  2 अक्टूबर गांधी जयंती के नाम से सबको याद रहता है। मगर इसी दिन एक और महान आत्मा ने धरती पर जन्म लिया था। वो थे लाल बहादुर शास्त्री जी। ...

हिंदी हैं हम में हिंदी का विस्तार

राजभाषा हिंदी विश्व की तीसरी और भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी का इतना महत्व होता जा रहा है कि हिंदी को इंटरनेट से जोड़े बिना उसे व्यक्ति से नहीं जोड़ा जा ...

ये कैसा रक्षावचन

समाज में दरिंदगी दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। हर रोज एक नई लड़की का बलात्कार हो रहा है। दुनिया में इतनी गंदगी फैल चुकी है कि अब भाई बहन के रिश्ते को भी शक ने घेर लिया है। क्या भाई बह...

दिखावे में रंगता समाज

सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं .... आज बदलते वक़्त के साथ 15 अगस्त का जायका भी बदल गया है। स्कूलों में लड्डू इमरती और सुहाल कि जगह अब चॉकलेट और टॉफी ने ले ली है। इसे बाज़ारीकरण ही कहेंगे, जब एक मिठाई पसंद देश में कुछ मीठा चॉकलेट खाकर किया जा रहा है। आज समय के साथ राष्ट्रीय पर्व मनाने के तरीकों में भी बदलाव आया है। वो दिन अनमोल थे, जब बच्चे लड्डू पाने के लालच में 15 अगस्त को स्कूल जाना नहीं भूलते थे। जिनको इस दिन का मतलब तक नहीं पता था उनको ये पता होता था आज स्कूल में लड्डू बटेंगे। तब न इतनी टेक्नोलॉजी थी और न ही दिखावे से रंगा बाज़ारीकरण। तब चॉकलेट खाने को शायद ही कभी मिल पाती थी। वो स्कूल में मिलने वाले मोतीचूर के लड्डू खाये हुए अरसा हो जाता था। आज जिन स्कूलों में टॉफी, चॉकलेट बांटने का प्रचलन हो गया है वहाँ के बच्चों के मन पहले से ही चॉकलेट और टॉफी से भरे रहते हैं। जो स्नेह और प्यार मिठाई या लड्डू खाने से मिलता है वो चॉकलेट में कहाँ। ये आज के उभरते सितारे हैं इनकी पसंद को क्या कहें। इनको जिधर ले जायेंगे ये चले जायेंगे। नई पीढ़ी के जितने भी स्कूल अंग्रेजी माध्यम...

एक दस्तक ज़िन्दगी की

स्तब्ध हूँ हैरान हूँ दुनिया की इन रस्मों से आज भी अंजान हूँ न जोश है न प्यास है न कुछ कह रहा एहसास है धैर्य है और आस है एक अपना अलग संसार है फिर क्यूँ अचानक से मुझसे कोई कह रहा कुछ ख़ास है उस रौशनी से गुलज़ार रौशनदान से कोई दे रहा आवाज़ है लग रहा है ऐसा जैसे कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है वो आँचल पकड़कर मुझको बुलाती है उन सो चुके जज़्बात को कुछ सुरीले मधुर अल्फ़ाज़ से  नग्में सुनाती है कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है मैं थी कहीं ख़ामोश सी कुछ बेचैन सी बेताब सी ज़िन्दगी के बदलते रंग में मैं रंगती आसमान सी फिर से अचानक यूँ लगा वो बाँहों के झूले में मुझको झुलाती है कहीं ज़िन्दगी एक दस्तक़ सी देती है ।।

पहली मुलाकात

   इंतज़ार था मुझे उस सुहानी सी शाम का जब उस शाम की प्यारी सी छाँव में मैं इंतज़ार करूँगी उनका। वो शाम मुझे अपने आगोश में करने को बेकरार तो बहुत होगी मगर मेरा हुस्न तो किसी और के दीदार की चाहत में तड़प रहा होगा। मेरी आँखों में वो इंतज़ार की प्यास मुझे और भी ज्यादा शर्मसार कर रही होगी।   आज वो शाम आ गई थी जब मैं अपनी ख़ुशी किसी और के साथ बाँटने को राज़ी न थी। मैं ख़ुद में सिमटती सी जा रही थी जैसे कुछ अनकहे से अल्फ़ाज़ मेरे नाज़ुक से मन पर कहर बरसा रहे हों, कुछ कहने को ललकार रहे हों। मगर इन होंठो ने तो एक दूसरे को इस कदर जकड़ रखा था जैसे कि बरसों से मिलन की प्यास में तड़प रहा कोई प्रेमी।   उस मुलाकात का तो कुछ अलग ही अंदाज था जब सितारों से ज़र्द रात उस अंधकार के आंगन में अपना डेरा बसाने जा रही थी तो जुगनू भी पेड़ों पर अपना समां बाँधने को बेकरार थे और रात का अंधेरा अपने साथ कुछ खुशियाँ कुछ नाज़ुक सी खामोशियाँ ला रहा था।  जैसे ही मैं उस शाम की नशीली सी छाँव में उनका साथ पाकर खिलखिला रही थी मानो उतनी ही तेजी से चँदा की चाँदनी चमकती जा रही थी।  ये पहली मुलाकात की वो...

सिक्कों सा खनकता बचपन

       बाज़ार में छाई हुई हर ओर की रंगीनियां मुझे लुभा रही थीं और अपने पास बुलाने को बेबस कर रही थीं। मगर उस गर्मी की सुलगती धूप में मैं चली जा रही थी। उस सड़क की गरमाहट मुझे और जला रही थी। पास निकलने वाली गाड़ियाँ मुझे ऐसे दिख रही थी जैसे कि मैं हर एक गाड़ी का पीछा कर रही हूँ और इस कदर भागना चाह रही हूँ जैसे वो गाड़ी भाग रही थी। मेरी चाल हर पल बढ़ती जा रही थी और जल्द से जल्द वो दूरी लाँघकर अपने घर के दरवाजे की चौखट पर पहुंचकर सबसे पहले एक लम्बी साँस लेना चाहती थी।     मैं चल ही रही थी कि तभी मेरे पास से एक बाबूजी गुजरे, बाबूजी सर को धूप से बचाने के लिए सर पर एक सफेद गमछा लपेटे हुए थे। उनको देखकर भी यही लग रहा था कि बाबूजी भी बस किसी तरह अपने घर की वही चौखट पाना चाह रहे हैं जो मैं इस सुलगती धूप में पाने को व्याकुल थी।    बाबू जी को पास से गुजरता देख मैं कुछ ठहरी, वो 70,80 की उम्र में भी उनमें इतना जोश था कि मैं हैरान थी, मैं उनके पीछे चलते हुए उन्हें देख रही थी कि तभी मेरी मेरी नज़र उनके कुर्ते की उसी जेब पर पड़ी जिसमे कुछ सिक्के रखे थे।वे इत...