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Showing posts from 2017

बहुत याद आती हो तुम

तेरा यूँ साथ चलना तेरा यूँ मुस्कुराना  मेरे हर सुख़ दुख़ को अपना कहना मुझे बहुत याद आता है मेरे माथे पर पड़ी उन सिलवटों को देखकर तेरा मुझसे कुछ पूछना मेरे लाख मना करने पर भी  तेरा मेंरे मन को पढ़ लेना अद्भुत था कभी साथ चलते चलते तेरा कुछ सोचना फिर दूर जाकर बैठकर तेरा मुझसे कुछ पूछना आज भी सब याद है कुछ नहीं भुला हूँ मैं तेरे संग बिताये हुये  हर एक पल का हिसाब  लिखा है मेरे पास कभी आओ तुम भी पढ़ो तो शायद मैं भी पढ़ लूँ थोड़ा तेरे बग़ैर दिल नहीं चाहता  उस डायरी को उठाने का मुझे भीतर तक झकझोर देती हैं तेरी वो यादें तेरी वो बातें सोचता हूँ कि हँसकर याद करूँ तुझे मग़र न जाने क्यूँ ये उदासी दूर जाती नहीं न जाने कितना पसंद आ गया हूँ मैं इसको कभी किसी छोटी सी बात पर  तेरा रोना तेरी उस उदासी भरी शक़्ल में तेरी मासूमियत छिपी होना याद करता हूँ तो  एक मुस्कान लाने को मजबूर हो जाता हूँ समझ नहीं आता  अब क्या करूँ इन यादों का इन को हँसकर याद करूँ या यूँ ही रोता रहूँ  टूट चुका हूँ मैं मै...

तेरे शहर में

        सुनों !! क्या तुम्हें मेरे आने का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ क्या मेरे क़दमों की आहट ने तुम्हें और बेचैन नहीं किया, तुम्हें कुछ तो महसूस हुआ होगा कि मैं यहीं हूँ तेरे पास .... तेरे शहर में ....     मैं यहीं तो हूँ तेरे पास तेरे शहर में मगर इन नज़रों ने कभी तुझे देखा नहीं इन तरसती आँखों ने तुमको ढूँढा तो बहुत मगर तुम्हारी वो एक प्यारी सी मनमोहक झलक मुझको दिखी नहीं तुम्हारी तस्वीर बसी है मन में मेरे .... मगर मैं तो तेरा दीदार चाहता हूँ तेरे इस प्यार भरे दिल से कुछ अल्फाज़ माँगता हूँ तू मुझे न सही किसी और को समझकर सामने आ जाये मेरे बस इतना सा ख़्वाब है मेरा कि मैं यहीं हूँ तेरे शहर में .....           मेरे पास से गुज़रने वाली उस हवा में मुझे तेरी ही खुशबू आती है मेरा ख्याल तो ये है कि कहीं तू हवा कि वो नर्म सी परत बनकर मुझे ढके तो नहीं है क्यूँकि मैं भी तो हूँ उसी शहर में जो हवा तुझे छूकर गुज़रती है ....   सुनो !! कब दीदार होगा तुम्हारा .... तड़प रहा हूँ तुमसे मिलने को तेरे ही शहर में ....         अपने मुख...

कहाँ है तू ..... ऐ ज़िंदगी

                           महकती थी बहकती थी पर ना जाने क्यूँ कुछ दिनों से  ऐसा लगता है  कि जैसे कहीं ठहर सी   गई है ज़िंदगी ....  न जाने कहाँ जाकर ठहर  गई है ....  कुछ पता नहीं  😥    .....  कुछ कहकर नहीं गई ,  कब आयेगी   ये बताकर भी नहीं गई . इतने दिनों से चलते हुए शायद थक गई होगी थोड़ा ..... इसीलिए ठहर गई होगी . पर अब तो आ जाना चाहिए था उसको अब तो दिन बहुत हो गये अब तो ख़ुद की साँसे भी डराने लगी हैं मुझे .       सम्भालती हूँ ख़ुद को बहुत मगर मन की आशा और निराश होती चली जा रही है . मेरे आँगन की देहलीज पर फ़फ़कता  हुआ दीपक मुझे और बेचैन कर रहा है.  उसकी फ़फ़कती हुई लौ ऐसे बार-बार डराती है मुझको कि मुझे बस ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे ज़िंदगी चली आ रही हो और मैं इतनी सी उम्मीद को पाकर हर बार ख़ुशी की आँधियों में उड़ने लगती हूँ मगर अफ़सोस .... वो ख़ुशी की आँधी बस कुछ ही क्षणों की मेहमान होती है . मैं सोचती हूँ सम्भाल लूँ ख़ुद को ...

प्रदुम्न की याद में ...... कुछ मेरी कलम से

           कितना तड़प रही होगी वो माँ            जिसका लाल उससे बिछड़ गया            अँखियों के बंद झरोखों से            अंसुओं की धार बहा गया                                    पागल सी वो तड़प रही                        उसका लाल उसे मिल जाये कहीं                                         मगर अफसोस बेरहम दुनिया का                        या कुदरत कोई खेल खेल गया         ...

वक़्त

        सोंचती हूँ तो लगता है कितनी सुन्दर होती है उस वक़्त की जिन्दगी, हर आदमी जिसका गुलाम बना फिरता है। आज हर आदमी बस वक़्त के पीछे भाग रहा है और बस उसे पाने की लालसा में भटकता फ...

शब्द से बदलती दुनिया

           दोस्तों शब्द क्या होते हैं ? कितना महत्व होता है इन शब्दों का हमारे जीवन में, क्या कभी कुछ सोचा है आपने।         जब हम अपने विचार किसी दूसरे तक पहुंचाते हैं तो उसमें हम शब्दों का सहारा लेते हैं और यही शब्द मिलकर एक वाक्य बना देते हैं। जिसको हम 'बात' कह सकते हैं, हमने तुमसे ये बात कही या तुमने हमसे वो बात कही, पर ये बात आई कहाँ से, ये बात बनी कहाँ से ? ये बात बनती है कई शब्दों को मिलाकर ।         कभी किसी बात को कहने के लिए हमें अनेक शब्दों को जोड़ना पड़ता है और कभी हम एक ही शब्द में पूरी बात कह जाते हैं । जिसके आगे शायद हमें और कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। हमारे जीवन में शब्दों का उतना ही महत्व है जितना की भाव का। कभी बिना शब्द के ही किसी दूसरे से हम अपने भाव व्यक्त कर देते हैं और कभी हम बिना भाव के ही कोई शब्द कह देते हैं ।      सच तो ये है हमको अपने भाव को व्यक्त करने के लिए शब्दों का सहारा लेना पड़ता है, शब्द के बिना भाव अधूर...

"जब तुम याद आये"

       वो शीतल सी लहर की आवाज ऐसे ढक रही थी मुझको जैसे खुले आसमां में बरसती मीठी सी ओस, वो गाने की धीमी सी धुन कुछ कह रही थी मुझसे, जैसे कोयल की मीठी बोली में कोई अलपती सी राग हो। वो मेरे मन का कुछ ना बोलना, वो मेरी आँखो में कुछ सपनों का होना। ये सब मेरे जज़्बातों की वो शाम थी जो मुझपर कहर ढा रही थी। खुदपर काबू पाने को ललकार रही थी। मगर मेरी वो मासूमियत तो मुझपर फ़िदा हो गयी थी जो आज इस ढलती हुई शाम के साथ मेरा बहुत कुछ ले जाने को तैयार थी।        इस अकेलेपन की चादर में मैं लिपटती सी जा रही थी, वो चादर की नर्म सी परत बार-बार ढक रही थी मुझको, मेरे सपनो को जगा रही थी और मेरी खामोशी को और भी ज्यादा खामोश करने की कश्मकश में लगी हुई थी। मगर वो बेईमान रात आज और ज्यादा बे ईमान हो गई थी, मानों कुछ ही अल्फाजों में सब कुछ लूट लेगी मेरा। मगर मेरी तन्हाई उस बेईमान रात पर फ़िदा हो गई और मुझको अपने आगोश में करके उस सफर पर चल दी थी जहां पर न मंजिल थी न किनारा। बस एक उम्मीद थी उस रात में आने वाले उस कहर की, मगर अब तो कहर ने भी बरसाना छोड़ दिया था...

"सत्यता"

मानव जीवन में सत्यता को स्वीकारना अपने आप में ही एक अदभुत चुनौती है चाहे वो किसी भी रूप में हो ! मनुष्य को कभी भी सत्यता से मुख नहीं मोड़ना चाहिये उसे हर रूप में स्वीकारना ही उसका मानव धर्म होना चाहिए ! यदि सत्यता को न स्वीकारोगे तो कहाँ जाओगे ? खुद से दूर या फिर इस समाज से दूर ! सत्यता से बचने के लिये भले ही तुम खुद से दूर भाग लो परन्तु सत्यता कहीं नहीं भाग सकती क्योंकि वह तो अखण्ड होती है ! उसमें कोई भी छल ,द्वन्द या द्वेष विद्घमान नहीं होता ! परन्तु मानव अपने अहंकार के रहते उसे स्वीकार नहीं पाता ! यही कारण है कि उसे मानव जीवन भी एक अभिशाप लगने लगता है !

पापा की याद

    बात उस समय की है जब मैं अपनी पढाई करने के लिये अपने घर से दूर एक हॉस्टल में आकर रहने लगी थी इससे पहले मैं अपने घर से इस तरह से कभी दूर नही हुई थी , ऐसे में घर की याद आना तो स्वाभाविक था , घर की याद करते हुए मैं अक्सर रोने लगा करती थी तभी मैंने अपने पापा की याद करके कुछ लिखा था जो आज मैं फादर्स डे के अवसर पर उनको सुनना चाहूँगी ..... love u so much papa n happy father's day   पापा जब तुम आओगे और मुझको गले लगाओगे कहीं रो न दूँ मैं तुम्हें देखकर ये सोंच के तुम घबराओगे पापा जब तुम आओगे .... अपनी लाडो को यूँ देखकर  प्यारी मुस्कान तो लाओगे  गर आ भी गये दो आँसू छल से  फिर मुझसे नजर चुराओगे  पापा जब तुम आओगे ..... क्या लाओगे साथ तुम अपने  मेरे लिये कुछ खाने को  बस दे देना एक मुस्कान सुहानी  तुम अपना हाल बताने को  माँ कैसी है ये बतलाना  कैसा है गाँव मेरा  ठीक नहीं होगा फिर पापा  गर मुझसे कुछ छुपाओगे !! पापा जब तुम आओगे                ...

Blessings for my sister ....

               रंग जाओ अब उनके रंग में                    प्रीत भरे इस जीवन में                जीवन की लहरों में छुपकर                     घूँघट के उस आँचल में                आँचल की खुश्बू में छुपकर                     रंग जाओ तुम दर्पण में                दर्पण के भीतर प्यारी सी                      झिलमिल झिलमिल सी आँखों में                आँखों के काजल से रंग लो                      या रंग लो उनके मन से खुद को                 फूलों कलियों सा प्यारा जीवन           ...

Dedicated to vartika nanda ma'am ....

तुम्हारे जज्बे को सलाम तुम्हारे सपने को सलाम तुम्हारी बातों में सिमटी हर आहट को सलाम          सलाम तुम्हारे अपनेपन को          संघर्ष भरे जीवन को          इस जीवन की कश्ती ...

मन का दर्पण

               कैसा है ये मन का दर्पण            पता नहीं क्या कहता है             खुली किताब कलम को लेकर             सपने लिखता रहता है             खोये सपने ख्वाब सुहाने             सब कुछ सहता रहता है                         पंख लगाकर पंछी स्वर में                         गीत सुनाता रहता है                         मन की एक मुस्कान सुहानी                         लेकर चलता रहता है                         कैसा है ये मन का दर्पण                       ...

मेरे भगवान

                    कैसे बताऊँ मैं तुम्हें       क्या हो तुम मेरे लिये ....               तुम ही मेरा अभिमान हो        तुम ही मेरा ईमान भी       तुम मेरे मन की सुन्दरता       तुम ही मेरे जहान हो       कैसे बताऊँ मैं तुम्हें                                                                                              मैं तो हूँ तेरा एक टुकड़ा                    तुम मेरे भगवान हो                    पूजा करती मैं हरपल तेरी              ...

सिमट सा गया बच्चों का बचपन

               कितना अच्छा होता है वो बचपन कितनी खुशहाली होती है. मानो कोई फ़िक्र तो होती ही नहीं है साथ ही साथ में अपनी वो सभी मन्मर्जियाँ होती हैं जो शायद अब नही हो पाती हैं.             अब सोंचते हैं तो हँसे बिना नहीं रह पाते की जब हम खेलते थे वो खाना पकाना. उन छोटे छोटे प्लास्टिक के बर्तनों में झूठ मूठ का खाना बनाते थे फिर उसको बड़े ही चाव से खाते थे फिर बस यही लगता था की इस खाने से स्वादिस्ट खाना हमे आजतक कोई मिला नही. सारे गुण सारे तत्व सब इसी खाने में समां गए  है. सच में क्या कहें .... बहुत याद आती है उन सभी खेलों की जो हम लोगो के फेवेरेट होते थे , गुडिया खेलना , इक्कल दुक्कल , आईस पाइस और सबसे ज्यादा पसंदीदा खेल हम लोगों का 'खाना पकाना' जिसे हम कहते थे चुक्कू पकाना भी कहते थे         जब आजकल के बच्चों को देखते हैं तो उनमे सब बदलाव नजर आते हैं ये बच्चे वो खेल क्यों नहीं खेलते जो हम खेला करते थे, क्या आजकल के बच्चे हमसे ज्यादा स्मार्ट हो गये हैं जो हम लोगों की तरह मिटटी में खेलना या...

बुढापे की हार

            कहना बिलकुल गलत नहीं होगा की जैसे जैसे इंसान की उम्र बढती जाती है अर्थात वो जैसे ही बुढ़ापे की ओर अग्रसर होने लगता है उसमे वो आपा जिसे हम लालच कह सकते हैं न जाने कहाँ से आ जाता है. हर चीज से उसका लालच बढ़ता ही जाता है. वो घर की हर एक चीज को सहेजकर रखने के आदी बन जाते हैं. उनमे वो सोंच और समझ घर बना लेती है की कोई भी चीज फेंको मत, भले ही वो कबाड़ ही क्यों न हो, कबाड़ भी वो घर से बाहर निकलने नही देते. उस कबाड़ को सहेजकर रखना उनकी आदत में शुमार हो जाता है.             अब अगर ये कहें कि क्यों वो हर चीज को सहेजकर रखना चाहते हैं तो ये कहना भी गलत नहीं होगा की उस हर चीज में उनको वो अपनी झलक दिखाई पड़ती है जो उनके द्वारा लायी या बनाई गयी होती है जिसे वो फेंकने से इंकार करते रहते हैं. उनसे बगैर पूछे अगर कोई सामान घर से बाहर निकाल दो तो वो सारा घर सर पर उठा लेते हैं और कभी कभी तो उनका गुस्सा काफी हद पार कर जाता है जिस पर काबू पाना और उनको संभालना मुश्किल हो जाता है.         लालच बढ़ने के साथ साथ उनमे यादास्...

बेटी का ब्याह

        बेटी का ब्याह करने का सपना अपने मन में लिए हर माँ बाप जी रहा होता है. वही माँ बाप अपनी बेटी का ब्याह करने के बाद अपने आपको धन्य समझने लगता है क्यूंकि उनकी लाडो अब किसी और के घर की मालकिन बनने तथा किसी और का घर सम्भालने को तैयार होती है. यही सोंचकर माँ बाप भी अपनी बेटी को ख़ुशी ख़ुशी विदा कर देते हैं.   ठीक ही कहा गया है की -  आंसूओं की एक बूँद सी होती हैं बेटियां  दो दो कुलों के बोझ को ढोती हैं बेटियां  बोये जाते हैं बेटे पर उग आती हैं बेटियां  हीरा अगर है बेटा तो मोती है बेटियां   आइये जनता हैं की एक बेटी का ब्याह किन रस्मों के साथ पूर्ण हो पाता है -                                                                                                   ...

माँ

              क्या तुमने मुझसे कुछ कहा था माँ               मैं सुन न सकी तेरी वो आवाज                शायद मैं खोई थी कहीं                या फिर बह गई थी कहीं                कि मुझे महसूस तो हुआ                 पर मैं सुन न सकी तेरी वो आवाज                 क्या तुमने मुझसे कुछ कहा था माँ                 थी तो मैं यहीं तेरे पास                 पर आँचल में तेरे सोने लगी थी                 सपनों की बगिया सजाने लगी थी                 कुछ गूँज सी सुनाई दी थी मुझे                 पर मैं सुन न सकी तेरी वो आवाज  ...

ब्लॉग का बलबला

ये हैं मेरे अच्छे वाले दोस्त  आज मैं बहुत खुश वाली हैप्पी हूँ |अरे हैप्पी नाम वाला सरदार नहीं मैं हैपी वाली खुश हूँ |अच्छा ज्यादा दिमाग ना लागाओ मुझे पता है सारा दिमाग मेरे पास है इसलिए मैं ज्ञानी हूँ और तुम सब मुर्ख अज्ञानी | 😀 अज्ञानी से याद आया बने रहो पगला काम करेगा अगला खैर आज मैं बेवकूफ नहीं बनी और मैंने अपना ब्लॉग बनाया और मैने अपना ब्लाग अपनी क्लास में अपने सभी दोस्तों और अपने गुरू जी के साथ मिलकर बनाया !       ये मेरे साथ एक यादगार पल के रूप में हमेशा साथ रहेगा जो हमेशा मुझे मेरे दोस्तों की और मेरे गुरू जी की याद दिलाता रहेगा !!☺